Skip to content

17 अगस्त / बलिदान दिवस – अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाला किल्ला पठानिया वजीर रामसिंह पठानिया — VSK Bharat

नई दिल्ली. अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध भारत के चप्पे-चप्पे पर वीरों ने संग्राम किया है. हिमाचल प्रदेश की नूरपूर रियासत के वजीर रामसिंह पठानिया ने वर्ष 1848 में ही स्वतन्त्रता का बिगुल बजा दिया था. उनका जन्म वजीर शामसिंह एवं इन्दौरी देवी के घर वर्ष 1824 में हुआ था. पिता के बाद वर्ष 1848 में वजीर का पद सम्भाला. उस समय…

via 17 अगस्त / बलिदान दिवस – अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाला किल्ला पठानिया वजीर रामसिंह पठानिया — VSK Bharat

15 अगस्त / जन्म दिवस – स्वतन्त्रता के उद्घोषक श्री अरविन्द — VSK Bharat

नई दिल्ली. भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता, पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष कहलाये. उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 को डॉ. कृष्णधन घोष के घर में हुआ था. उन दिनों बंगाल का बुद्धिजीवी और सम्पन्न वर्ग ईसाइयत से अत्यधिक…

via 15 अगस्त / जन्म दिवस – स्वतन्त्रता के उद्घोषक श्री अरविन्द — VSK Bharat

वंदेमातरम्॥

सत भाषै रैदास

Source: सत भाषै रैदास

सत भाषै रैदास

जब जीवन हाथ में है, ऊर्जा है, उमंग है, कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य है, चुनौतियां लेने का साहस है, पर्वत चढ़ने का साहस है, तब चढ़ो। जब अस्थि-पंजर हो जाओगे, क्या तब भजोगे राम?

वह भक्ति तो फिर मुर्दों की होगी! उस भक्ति में फिर फूल खिलना कठिन है। जिसमें पाप करने की क्षमता नहीं रह जाती, उसमें पुण्य करने की क्षमता भी नहीं रह जाती, यह गणित याद रखने जैसा है।
क्षमता तो एक ही है, चाहे धन कमा लो, चाहे ध्यान।

चाहे मरुस्थल में भटक जाओ या सागर पर पहुंच जाओ।

रैदास वही कह रहे हैं—

‘जो दिन आवहि सो दिन जाही। करना कूच रहन थिरु नाही।।

संगु चलत हैं हम भी चलना। दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना।।’

—-

.

.

समग्र स्वीकार क्या है?

यह समग्र स्वीकार शब्द ही अपने आप में कहीं अस्वीकार की छाया लिये हुए है।

लोग हिंसक हैं—हम एक प्रतिक्रिया निर्मित करते हैं और उससे अहिंसा के शिक्षण का एक दर्शन पैदा होता है। कोई व्यक्ति जो हिंसक रहा हो, बौद्धिक रूप से कायल हो सकता है कि वह सही नहीं है, वह अहिंसक होने के लिये प्रयास भी कर सकता है, लेकिन उसकी अहिंसा भी वही हिंसक वृत्ति रखेगी।

और यह केवल सामान्य लोगों के विषय में ही नहीं, महात्मा गाँधी जैसे लोग तक, जो अहिंसा के अग्रदूत बन गये, अपनी पूरी जिंदगी एक गहरे में गड़ी हिंसा ढोते रहे।

इसके लिये कुछ उदाहरण दिये जा सकते हैं, ताकि बात समझ आ सके।

महात्मा गांधी हर उस चीज के विरुद्ध थे जो तकनीकी, विज्ञान और मनुष्य की प्रतिभा द्वारा चरखे के बाद विकसित की गयी है। उनके चरखे के साथ इतिहास रुक जाता है। अब सीधे-सीधे कोई नहीं देख सकता कि यह बात हिंसक क्यों होनी चाहिए। लेकिन, यदि आदमी चरखे के साथ रुक जाता है तो विश्व जनसंख्या का लगभग दसवां भाग मौत के मुंह में जायेगा। निश्चित ही गांधी दस प्रतिशत मानवता की मृत्यु प्रस्तावित नहीं कर रहे हैं, लेकिन वह अंतर्निहित है। और वे जो बचेंगे, कुपोषित, भूखे, कंगाल, बिना छप्पर के होंगे। और यह सब एक सुंदर शब्द ‘अहिंसा’ के नीचे छिपा दिया गया है।

अपनी खुद की जिंदगी में, गांधी उतने हिंसक व्यक्ति थे जितना कोई खोज सकता है। उनका सबसे बड़ा लड़का, हरिदास, पढ़ना चाहता था और गांधी पश्चिम से आयी हर चीज के विरुद्ध थे। यह एक करुणावान व्यक्ति का दृष्टिकोण नहीं है। करुणावान व्यक्ति केवल एक विश्व जानता है। और उन्होंने हरिदास के खिलाफ जो तरकीब की वह यह थी: उन्होंने कहा, ‘यदि तुम शिक्षित होना चाहते हो, तो फिर कभी मेरा चेहरा नहीं देखोगे।’ क्या तुम इसमें कोई अहिंसा देखते हो?

उन्होंने हरिदास के लिये दरवाजे बंद कर दिये। उसे पिता की चिता में अग्नि देने की भी अनुमति नहीं थी। और उसका अपराध क्या था? सिर्फ यही कि वह शिक्षित होना चाहता था!

गांधी बहुत मतांध विचार रखते थे, और मतांध विचार और अहिंसा की आपस में नहीं बनती। हर किसी को शौचालय साफ करना होता था… और उन्हें पाश्चात्य ढंग के शौचालय मत समझना—भारतीय शौचालय गंदे से गंदे, घिनौने सॆ घिनौने होते हैं।

उन्होंने अपनी पत्नी को अपने आश्रम के शौचालयों की सफाई में भाग लेने के लिये बाध्य किया। उसने इंकार किया। लेकिन गांधी ने कहा, ‘यदि तुम इंकार करती हो, तो यह तुम्हारा घर नहीं है और मैं तुम्हारा पति नहीं हूँ।’ यह बात किसी हिंसक व्यक्ति के लिये उपयुक्त है, लेकिन एक प्रेमपूर्ण व्यक्ति के लिये नहीं।

एक रेलवे स्टेशन पर हरिदास भीड़ में छिपा था; गांधी ट्रेन से गुजर रहे थे और हरिदास दूर से सिर्फ अपने पिता का चेहरा, अपनी माँ का चेहरा देखना चाहता था। लेकिन गांधी को अपने अनुयायियों से सूचना मिल गयी थी कि अगले स्टड पर हरिदास इंतजार कर रहा था। डिब्बे के सभी दरवाजे, खिड़कियां बंद कर दी गयीं, और गांधी ने अपनी रोती हुई पत्‍नी से कहा, ‘ तुम अपने आंसुओं को रोको, क्योंकि वे दिखाते हैं कि तुम मेरे साथ नहीं हो बल्कि हरिदास के साथ हो।’

और हरिदास ने अपराध क्या किया था? वह सिर्फ समसामयिक ढंग से सुशिक्षित हुआ था।

और गांधी के जीवन में इतनी घटनाएं हैं जिनमें वह सर्वथा हिंसक है, लेकिन ‘अहिंसा’ का छाता सब कुछ छिपा लेता है।

प्रश्न है, “समग्र स्वीकार क्या है?” पहली बात, या तो स्वीकार समग्र होता है या होता ही नहीं। ‘समग्र स्वीकार’ बताता है कि तुमने अपने अचेतन में गहरे कुछ दबा रखा है और इसे दबाये रखने के लिये तुम अपनी समग्र ताकत लगा रहे हो।

स्वीकार सरल होना चाहिए। सहज होना चाहिए, इसे किसी विशेष विचारधारा से नहीं उत्पन्न होना चाहिए। इसे तुम्हारी समझ से आना चाहिए। तब समग्र या असमग्र स्वीकार का कोई प्रश्न ही नहीं है। दृष्टि की स्पष्टता तुम्हें स्वीकार अथवा अस्वीकार दिखाएगी।

राम बोलो।।

.

.

क्षण-क्षण

Source: क्षण-क्षण

क्षण-क्षण

. जीवन योजना बद्ध नहीं है। और यही एक मात्र ढंग है, जीवंत होने का। . संपूर्ण अनियोजित, भविष्‍य के संबंध में बिलकुल अनभिज्ञ–यहां तक कि अगले क्षण के संबंध में भी। आज पर्याप्त है–वास…

Source: क्षण-क्षण

साधु-संगत!!!

wpid-img-20141217-wa0003.jpg.

वहां प्रभु की अनुकंपा की बात होती है। वहां तुम्हारे दुख, तुम्हारे अंधेरे, तुम्हारे अज्ञान की बात होती है। वहां तुम्हारे आंसू जगाए जाते हैं, खो गये आंसू-पुन: पुकारे जाते हैं। और साथ ही परमात्मा की अनुकंपा की बात की बात होती होती है। क्योंकि वहां तुम्हें खबर मिलती है कि तुम्हारा पाप कितना भी बड़ा क्यों न हो, मगर उसकी करुणा उससे बड़ी है। पुकारो भर। तुम इतनी दूर नहीं जा सकते कि वह तुम्हें उठा न ले। भगवान के हजार हाथ हैं, वह सब तरफ से उठा लेगा, लेकिन कब तक जब तक तुम पुकारो ना।

साधु-संगत में जीवन का दुख दिखाई पड़ता है। दुख ही दुख है यहां। यहां सुख कब किसने जाना! कभी यदि सुखी आदमी मिल जाए तो तत्क्षण पाओगे: वह यहां का नहीं है। वह वहाँ का है, यहां परदेश में है। यहां अजनबियों के बीच है।

है रहीमो करीम अपना ख़ुदा

हमसे लुत्फो करम की बात करो।

तो वहां पाप की बात होती है: परमात्मा की करुणा की बात होती है। वहां हमारे दुख-पीड़ा की बात होती है।

हिज्र भी है वसाल का पैगाम

ऐसे राहत सितम की बात करो।

वहां विरह की बात होती है और विरह के साथ ही साथ यह भी बात होती है कि विरह उससे मिलन की सूचना है; उससे मिलन की तैयारी है। हमने उसे खोया है पाने को। यह विरह भी उसके मिलन को प्रीतिकर बनाने वाला है।

हिज्र भी है वसाल का पैगाम

इसमें संदेश छिपा है मिलन का।

जो क़दम हैं बनाते ख़ुद मंज़िल

इश्क़ के उस क़दम की बात करो।

जो क़दम बनाते ख़ुद मंज़िल, …जो कदम अपने आप में अपनी मंज़िल लिये हुए है, उस प्रेम के कदम की बात वहां होती है।

साधु-संगत यानी प्रेम की चर्चा।

———————-