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साधो शब्द साधना कीजे।

October 3, 2015

‘साधो सब्द साधना कीजे,

जेही सब्द ते प्रकट भये स, सोई सब्द गहि लीजे॥’

……………………………….(कबीर)

जिस मूल ध्वनि से हम सब आये हैं, उसी मूल ध्वनि में उतर जाओ। उसी में सीड़ियां बनाओ।

‘जेही सब्द से प्रगट भये सब, सोई सब्द गहि लीजे।

सब्द गुरु सब्द सुन सिख भये,सब्द सो विरला बूझै।’

शब्द ही गुरु है। वह जो तुम्हारे भीतर पड़ी है शांत ध्वनि,मौन प्रतीक्षा करती,  वही गुरु है। बाहर का गुरु तो उसी की याद दिलाता है। बाहर का गुरु तो तुम्हें वहीं-वहीं फेंकता है वापस, तुम्हारे ही भीतर फेंकता है। जो गुरु तुम्हें बाहर अटका ले, वह गुरु नहीं—दुश्मन है। वही सच्चा गुरु है, जो कहे: मुझे छोड़ो और अपने भीतर जाओ। क्योंकि मैं भी बाहर हूं। मुझसे इतना सीख लो कि कैसे भीतर जाया जाता है, फिर अपने भीतर चले जाओ। फिर बिसारो सब। गुरु भी सम्मिलित है उस बिसारने में। संसार भी भूल जाए, गुरु भी भूल जाए; धर्म भी भूल जाए—सब भूल जाए; विस्मृति पूरी हो जाए। जब बाहर की विस्मृति पूरी हो जाती है, तो स्मरण आता है भीतर का।

ये दौनों बातें एक साथ नहीं हो सकती। तुम्हारी ऊर्जा बाहर उलझी है, तो भीतर की कैसे स्मृति आए! बाहर से जब सारी ऊर्जा मुक्त हो जाती है, तो फिर क्या याद करोगे? कुछ याद करने को बचता नहीं, तो स्वयं को याद करोगे। जब कुछ नहीं रह जाता है खोजने को, तो आदमी स्वयं को खोजता है। जब और कहीं खोदने को कोई और जगह नहीं बचती, तब आदमी स्वयं के खजाने को खोदता है।

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