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उदासियों से भरी गगरी!!!

अक्टूबर 4, 2015
  • ये दिल अब खराब है
    ऐसा खराब कि
    बर्गे-मुर्सरत तो क्या
    इसमें खारे-अलम तक नहीं है
    न जश्न-ए-बहारा,
    न मातम खिज़ा का
    ये दिल अब खराब है
    लेकिन हमेशा खराब नहीं था।
    खिले थे यहां फूल भी आरजू के
    चुभे थे यहां खार भी जुस्तजू के
    ये दिल अब खराब है
    लेकिन,
    सदा बेनियाजे-बहारो-खिज़ा तो नहीं था
    मैं वो आशिके-रंगो-बू हूं कि जिसने
    लहू अपना सर्फे-बहारा किया था।

यह मामला—सभी का यही है। एक न एक दिन सभी को ऐसी उदासी आती है। सिकंदरों को भी आती है। सब पाकर भी पता चलता है कि कुछ हाथ न लगा, हाथ खाली हैं! हाथ ही खाली नहीं हैं, हृदय भी खाली है। सारा जीवन ऐसे ही मरूस्थल में खो गया। तब एक उदासी घेरती है।
तुम्हारे अतीत का सारा इकट्ठा संस्कार, तुम्हें उदास कर गया है।
और दूसरी बात इस उदासी में अभी भी कहीं छिपी हुई भविष्य की आशा है। नहीं तो उदासी टूट जाए। यह समझना थोड़ा कठिन होगा। जब किसी आदमी को तुम निराश देखो, तो यह मत समझना कि उसने आशा छोड़ दी है।
निराश होने का मतलब ही यही होता है कि आशा अभी भी कायम है। हालाकि जिंदगी ने आशा के सब उपाय तोड़ दिये हैं; लेकिन आशा अभी भी कायम है; नहीं तो बिना आशा के निराश भी कैसे होओगे? जितनी बड़ी आशा होगी, उतनी बड़ी निराशा होती है—उसी अनुपात होती है। अगर किसी आदमी की सारी आशाएं ही छूट गयीं, तो फिर निराशा भी नहीं हो सकती; फिर निराशा क्या!
उसी व्यक्ति को हम संयस्त कहते हैं, जिसने आशा करना ही छोड़ दिया। और आशा करना छोड़ा, तो आशा की जो छाया है—निराशा—वह भी विदा हो जाती है।
.
.
अभी इतना ही……….
………………dineshpandey92
———

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