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बुद्धत्व और उपलब्धि?

अक्टूबर 6, 2015

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कितने ही हजारों वर्षों से इतने लगातार ढंग से यह खयाल प्रतिपादित किया जाता रहा है कि बुद्धत्व एक उपलब्धि है। ठीक से समझो तो, बुद्धत्व कोई उपलब्धि नहीं है, यह तुम्हारा स्वभाव ही है। और यदि तुम इसका अभाव अनुभव कर रहे हो, तो कारण यह नहीं है कि तुमने इसे पाया नहीं है,कारण यह है कि तुम अपने भीतर छोड़कर शेष चारों तरफ हर जगह इसके लिये खोज रहे हो—प्रत्येक मंदिर में जाकर, प्रत्येक पवित्र शास्त्र पढ़कर, सभी प्रकार के मूढ़ों के पास जाकर जो सद्गुरु होने का ढोंग कर रहे हैं।

होना यह चाहिये कि तुम इसी क्षण घोषणा करो कि तुम प्रबुद्ध हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, इसकी कोई जरूरत नहीं है कि सभी तुम्हारी पूजा करें। कोई तुम्हारी पूजा क्यों करे? तुम बुद्धत्व के लिये अनावश्यक शर्तें लगा रहे हो।

अस्तित्व कभी समान व्यक्ति दुबारा पैदा नहीं करता है। इस सुंदर जगत का नियम समानता नहीं है, बल्कि अनूठापन है। और जिस क्षण तुम अनूठापन स्वीकार करते हो, तुम अन्य लोगों के लिये एक गहन समादर स्वीकृत करते हो जैसे भी वे हैं।

समझो, कहा यह जा रहा ह कि तुम अपनी साधारणता में ही पूर्णतया अच्छे हो। कुछ भी तुम में जोड़े जाने की जरूरत नहीं है। और यदि तुम इस साधारणता में विश्रांत हो सको, यही साधारणता ही, तुम्हारी विश्रांति के कारण आभामय हो उठेगी, खिलना शुरू हो जायेगी। तुम्हारा स्वीकार, तुम्हारा आत्मसम्मान एक पोषण होगा, तुम्हारे प्राणों में बसंत ले आयेगा, और फूल अपनी पंखुरियां खोलना शुरू कर देंगे।
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………(pandeydinesh92)
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