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सरलता ही एक मात्र धार्मिकता है।

अक्टूबर 19, 2015

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अलबर्ट आइंस्टीन से पूछा गया था,’यदि तुमने ‘सापेक्षतावाद के सिद्धांत’ की खोज न की होती, क्या तुम सोचते कि इसकी खोज कभी भी हो पाती?’ और स्वभावत: प्रश्नकर्ता आस्वस्त था कि जब तक अलबर्ट आइंस्टीन जैसा ही मस्तिष्क न हो, सिद्धांत खोजा नहीं जा सकता। लेकिन वह चौंक गया जब अलबर्ट आइंस्टीन ने उसको कहा,’यदि मैने इसको न खोज लिया होता तो अधिक से अधिक तीन सप्ताह के अंदर यह किसी और द्वारा खोज लिया गया होता। हजारों वैज्ञानिक बुद्धियां काम कर रहीं हैं। यह सौभाग्य ही था कि मैने जल्दी छलांग ले ली और शोध को प्रकाशित कर लिया।’

और यह अजीब ही है कि यह पाया गया कि एक अन्य जरमन भौतिकविद् ने आइंस्टीन से पहले ‘सापेक्षतावाद के सिद्धांत’ को खोजा लेकिन वह आलसी व्यक्ति था, वह बस इंतजार में ही रह गया। नल्दी भी क्या है? वह सोच रहा था कि कोई और इतने जटिल सिद्धांत को नहीं खोज लेने वाला है। उसके सारे नोट्स तैयार हो गये थे, केवल उसने उन्हें क्रमबद्ध नहीं किया था।

लेकिन क्या तुम सोचते हो कि अलबर्ट आइंस्टीन आज आद्यावधि है? तुम गलती में हो विज्ञान में कोई आद्यावधि नहीं रह सकता। हो सकता है कुछ क्षणों के लिये, कुछ दिनों के लिये, कुछ सप्ताहों के लिये।

दिलचस्पी सांसारिक, क्षणभंगुर और कालगत में लेने की जरूरत नहीं है। दिलचस्पी शाश्वत में लें। और शाश्वत का विज्ञान से और ज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं है। शाश्वत का लेना-देना रहस्यमय से और निर्दोष सरलता से है।

तुम बच्चे जैसे होओ, खुली आंखों, बिना कोई पूर्वाग्रह आंखों के पीछे छिपाये हुए बस स्पष्टता से देखो और छोटे से फूल या घास की पत्तियां या तितलियां या एक सूर्यास्त तुम्हें उतनी आनंदमयता दे जायेंगे जितना गौतम बुद्ध को अपने बुद्धत्व की घटना में मिली। सवाल चीजों का नहीं है, सवाल तुम्हारे खुलेपन का है।

ज्ञान तुम्हें संकुचित करता है। वह एक खोल, एक कैद बन जाता है।

और सरलता सारे दरवाजों को, सारी खिड़कियों को खोल देती है। प्रकाश भीतर आता है, शीतल वायु आर-पार बहती है। अचानक फूलों की सुगंध तुम्हारे घर आती है। और कभी-कभार कोई पक्षी आ सकता है और गीत गा सकता है और दूसरी खिड़की से निकल जा सकता है।

सरलता ही एकमात्र धार्मिकता है।

धार्मिकता तुम्हारे पवित्र धर्मग्रंथों पर नहीं निर्भर करती। यह इस पर नहीं निर्भर करती कि तुम दुनियां के बारे में कितना ज्यादा जानते हो। यह इस पर निर्भर करती है कि तुम कितने तैयार हो एक स्वच्छ दर्पण की भांति होने के लिये जिसमें कोई प्रतिबिंब न बन रहा हो।

निपट मौन, सरलता, पवित्रता, और तुम्हारे लिये पूरा अस्तित्व रूपांतरित हो गया। प्रति पल मस्ती भरा बन जाता है।


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