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‘मिश्रोपदेशात् न इति येत् न स्वल्पत्वात्॥’ …..(शांडिल्य)

अक्टूबर 23, 2015

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अर्थ:’उसमें मिश्रित उपदेश हैं, इस कारण आशंका मत करो। और वे थोड़े ही हैं।’

इस सूत्र को समझना—

शांडिल्य कहते हैं, अगर हम इस बात को मान लें कि हिंदुओं के वेद की ही तरफ उल्लेख है, तो वेद में बड़े विपरीत वक्तव्य हैं, मिश्रित वक्तव्य हैं, उनका क्या किया जाए? वेद एक ही बात नहीं बोलते, अनेक बातें बोलते हैं, एक दूसरे से विपरीत बातें भी बोलते हैं। अब जैसे, वेद में हिंसक यज्ञ इत्यादि का स्वीकार है कि यज्ञ में हिंसा की जा सकती है। और वेद में यह अपूर्व वचन भी है—’मा हिंस्यात् सर्वभूतानि। किसी प्राणी की कभी हिंसा न करें।’ और दूसरी तरफ अश्वमेघ यज्ञ में घोड़े की हत्या करनी पड़े। और नरमेघ यज्ञ भी होते थे। जिसमें मनुष्य की हत्या करनी पड़े। तो सवाल यह उठता है कि वेद में तो बड़े विपरीत वचन हैं, ये एक ही परमात्मा से कैसे आ सकते हैं? और अगर एक ही पिता ने दिये हैं, तो इतने विपरीत वचन कैसे हो सकते हैं?

और जैसा अर्थ हम कर रहे हैं, तब तो और भी अड़चन हो जायेगी। क्योंकि फिर वेद और कुरान और बाइबिल और धम्मपद एक ही से उतरे हैं। फिर कृष्ण, बुद्ध, महावीर एक ही से उतरे हैं। फिर इनके वचनों में तो बड़ा विरोध है! वेद में बड़ा विरोध है, फिर वेद और धम्मपद में तो बड़ा विरोध है। फिर बाइबिल और कुरान में तो बहुत विरोध है। वेद के ऋषि एक-दूसरे से सहमत नहीं हैं। तो फिर वेद के ऋषियों और बुद्ध और लाओत्सु में तो जमीन-आसमान का फर्क है। फिर क्या होगा?

शांडिल्य कहते हैं, उसमें मिश्रित उपदेश हैं, इस कारण आशंका मत करो। कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिये।

एक, निश्चित ही मिश्रित उपदेश हैं वेद में। क्योंकि एक ही पुत्र के लिये दिये गये उपदेश नहीं हैं। इतने पुत्र हैं परमात्मा के। और पुत्रों में बड़ा भेद है। जो एक के लिये उपदेश लागू है, वह दूसरे के लिये लागू नहीं है। और जो एक के लिये औषधि है वह दूसरे के लिये जहर हो जायेगा। किसी की बीमारी कुछ है, किसी की बीमारी कुछ और है। औषधि भिन्न होगी।

इसलिये वेद अकेले सार्थक नहीं हैं। बिना गुरु के सहारे तुम वेद में जाओगे, झंझट में पड़ जाओगे। वह वैसे ही है जैसे अकेले ही केमिस्ट की दुकान पर पहुंच गये, अपनी दवा तैयार करने लगे। पहले तो तुम्हें यही पता नहीं है कि तुम्हारी बीमारी क्या है? शायद बीमारी भी पता हो तो तुम्हें यह पता नहीं कि इस बीमारी की दवा क्या है? एक गुरु चाहिये, सद्गुरु चाहिये। जो वेद के हजारों-हजारों उपचारों में से तुम्हारे लिये क्या उपचार है, तुम्हें दे सके।
इसलिये शास्त्र सद्गुरु के बिना किसी मूल्य का नहीं है।
शांडिल्य कहते हैं कि वेद में जो विपरीतता है, वह पात्रों की भिन्नता के कारण है।

बिना सद्गुरु के शास्त्र खतरनाक हैं। सद्गुरु के साथ शास्त्र का मुल्य परम है। सद्गुरु के जीवन से अगर शास्त्र की ध्वनि तुम्हें फिर सुनाई पड़ जाये तो सद्गुरु के माध्यम से शास्त्र पुनरुज्जीवित होता है। और उस ढंग से पुनरुज्जीवित होता है जो तुम्हारे काम का है। तुम्हारे योग्य, तुम्हारे अनुकूल, तुम्हारी परिस्थिति की संगति में शास्त्र का पुनर्जन्म होता है। सद्गुरु का अर्थ ही यही है। शास्त्र का फिए-फिर जन्म। दुबारा-दुबारा। बार-बार।

पढो सारे शास्त्र! वही रास्ता है शास्त्रों से मुक्त होने का। और वही रास्ता है सद्गुरु की तलाश का। और धन्यभागी हैं वे, जिन्हें सद्गुरु मिल जाता है।
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अभी बस इतना ही…..


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