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क्या राजनीति अध्यात्म के विपरीत है?

अक्टूबर 25, 2015

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‘होली है, बुरा मत मानो!’
तुम आदमी नहीं हो।
तुम तो जिसके पास राजसत्ता है, उनकी प्रशंसा सुनने के ही आदी हो। तुम राजसत्ता से ऐसे मोहित हो गये हो कि जिन व्यक्तियों का कोई भी मूल्य नहीं है, वह पद पर बैठते ही एकदम महामूल्य के हो जाते हैं। और मजा यह है कि पद से उतरते ही फिर निर्मूल्य हो जाते हैं। फिर कोई नहीं पूछता उन्हें। पुष्प-मालाएं तो दूर लोग जूते इत्यादि भी नहीं फेंकते। बिल्कुल ही भुला देते हैं।

सत्ता एक माखौल है। एक झूठ है। जिससे आदमियत मुक्त हो जाए तो अच्छा। राजनेताओं से आदमी मुक्त हो जाएं तो अच्छा। राजनीति का इतना प्रभाव नहीं होना चाहिये। ठीक है, उसकी उपयोगिता है। मगर उसकी उपयोगिता इतनी नहीं है कि सारे अखबार उसी से भरे रहें। और सारे देश में उसी की चर्चा चलती रहे। जिंदगी में और भी काम की बातें हैं! राजनीति याने महत्वाकांक्षा। पदलोलुपता। लेकिन तुम्हारे मन पद लोलुप हैं। इसलिये जो पद पर पहुंच जाते हैं, उनके लिये तुम्हारे मन में बड़ी प्रशंसा होती है।
ध्यान रखना, क्यों होती है? तुम भी पद लोलुप हो। तुम भी चाहते थे कि पहुंच जाते, लेकिन नहीं पहुंच सके, दूसरा पहुंच गया, तुम सम्मान में सिर झुकाते हो। तुम कहते हो, हम तो हार गये,  लेकिन आप पहुंच गये। कोशिश हम अभी जारी रखेंगें, कि किसी दिन हम भी पहुंच जायें।

तुम खयाल रखना, तुम उसी का सम्मान करते हो जो तुम होना चाहते हो। तुम्हारे सम्मान में कसौटी है। वे दिन अद्भुत दिन रहे होंगे, जब लोगों ने बुद्ध का सम्मान किया, और राजाओं की फिकिर न की!!!
——-
जय श्रीराधे॥
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