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‘मैं पूरा पाया’ कहने वाले कबीर, जिनका एक पांव इस्लाम में था और दूसरा हिंदू धर्म में, गुरु के रूप में उतने प्रभावी क्यों नहीं हुए, जितना होना चाहिये था?

अक्टूबर 26, 2015

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कल मैं एक कविता पढ़ रहा था। कविता का नाम है—गुरु-पूजा।
पहले भी होती थी।
आज भी होती है।
गुर-पूजा।
केवल गुरु और पूजा के अर्थ बदले हैं।
वह बड़ा गुरु है,
पूजा बिना मानेगा नहीं!
‘गुरु’ का अर्थ करीब-करीब ‘गुंडा’ हो गया है! कहते हैं —बड़ा गुरु है… वह बड़ा गुरु है! और पूजा अर्थात् पिटाई …।
पहले भी होती थी
आज भी होती है।
गुरु-पूजा
केवल गुरु और पूजा के अर्थ बदले हैं।
वह बड़ा गुरु है,
पूजा बिना मानेगा नहीं!
धर्मगुरु के साथ शब्द की विकृति हो गयी। क्योंकि धर्म गुरु थोथा गुरु है, झूठा गुरु है।

झूठ के साथ ‘गुरु’ जुड़ गया इसलिये खराब हो गया, गंदा हो गया।

कबीर सद्गुरू हैं। सद्गुरू का अर्थ होता है: जिसने जाना। न केवल जाना, बल्कि जो दूसरे को जनाने में भी समर्थ है। न केवल खुद देखा, बल्कि दूसरों की आंखों में भी देखने की आकांक्षा जगा सकता है। न केवल खुद जिया, बल्कि दूसरे के हृदय को भी गुदगुदा सकता है—कि जो सोये पड़े हैं अंधकार में, उनमें से भी कुछ लोग उठ जायें और यात्रा पर निकल जायें। कठिन होगी यात्रा तो भी। पहाड़ की चढाई होगी, तो भी। खड्ग की धार होगी, तो भी।

गुरु का अर्थ है: जो खुद परमात्मा को चखा है और दूसरों के कंठों में भी ऐसी आतुर प्यास जगा दे कि वे भी परमात्मा को चखे बिना बैठे न रह सकें। उठना ही पड़े चलना ही पड़े—चाहे कितनी ही लम्बी हो यात्रा और कितने ही रेगिस्तानों को पार करना पड़े।

‘सद्गुरू’ बड़ा महिमाशाली शब्द है; ‘धर्मगुरु’ दो कौड़ी का।
और फिर दोहरा दूं कि सद्गुरू के पास धर्म है। और धर्मगुरु के पास न तो धर्म है, और न गुरुता है।

धर्मगुरु तो पुरोहित है, पादरी है, मुल्ला है। धर्मगुरु तो एक व्यवसाय का हिस्सा है। धर्मगुरु तो संसार के साथ जुड़ा है, बाजार के साथ जुड़ा है।

धर्मगुरु तुम्हें बदलता नहीं, तुम्हें सांत्वना देता है। सद्गुरू तुम्हें तोड़ता है, मारता है, काटता है; छैनी उठा कर तुम्हें निखारता है; छानता है। धीरे-धीरे-धीरे एक ऐसी घड़ी आती है जब तुम शुद्ध होते-होते शून्य हो जाते हो।

शून्य तक जो पहुंचा दे—वह सद्गुरू। लेकिन शून्य पर कितने लोग जाना चाहते हैं! इसलिये बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं होता।
——-
अभी बस इतना ही……..


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