Skip to content

समग्र स्वीकार क्या है?

जुलाई 13, 2017

यह समग्र स्वीकार शब्द ही अपने आप में कहीं अस्वीकार की छाया लिये हुए है।

लोग हिंसक हैं—हम एक प्रतिक्रिया निर्मित करते हैं और उससे अहिंसा के शिक्षण का एक दर्शन पैदा होता है। कोई व्यक्ति जो हिंसक रहा हो, बौद्धिक रूप से कायल हो सकता है कि वह सही नहीं है, वह अहिंसक होने के लिये प्रयास भी कर सकता है, लेकिन उसकी अहिंसा भी वही हिंसक वृत्ति रखेगी।

और यह केवल सामान्य लोगों के विषय में ही नहीं, महात्मा गाँधी जैसे लोग तक, जो अहिंसा के अग्रदूत बन गये, अपनी पूरी जिंदगी एक गहरे में गड़ी हिंसा ढोते रहे।

इसके लिये कुछ उदाहरण दिये जा सकते हैं, ताकि बात समझ आ सके।

महात्मा गांधी हर उस चीज के विरुद्ध थे जो तकनीकी, विज्ञान और मनुष्य की प्रतिभा द्वारा चरखे के बाद विकसित की गयी है। उनके चरखे के साथ इतिहास रुक जाता है। अब सीधे-सीधे कोई नहीं देख सकता कि यह बात हिंसक क्यों होनी चाहिए। लेकिन, यदि आदमी चरखे के साथ रुक जाता है तो विश्व जनसंख्या का लगभग दसवां भाग मौत के मुंह में जायेगा। निश्चित ही गांधी दस प्रतिशत मानवता की मृत्यु प्रस्तावित नहीं कर रहे हैं, लेकिन वह अंतर्निहित है। और वे जो बचेंगे, कुपोषित, भूखे, कंगाल, बिना छप्पर के होंगे। और यह सब एक सुंदर शब्द ‘अहिंसा’ के नीचे छिपा दिया गया है।

अपनी खुद की जिंदगी में, गांधी उतने हिंसक व्यक्ति थे जितना कोई खोज सकता है। उनका सबसे बड़ा लड़का, हरिदास, पढ़ना चाहता था और गांधी पश्चिम से आयी हर चीज के विरुद्ध थे। यह एक करुणावान व्यक्ति का दृष्टिकोण नहीं है। करुणावान व्यक्ति केवल एक विश्व जानता है। और उन्होंने हरिदास के खिलाफ जो तरकीब की वह यह थी: उन्होंने कहा, ‘यदि तुम शिक्षित होना चाहते हो, तो फिर कभी मेरा चेहरा नहीं देखोगे।’ क्या तुम इसमें कोई अहिंसा देखते हो?

उन्होंने हरिदास के लिये दरवाजे बंद कर दिये। उसे पिता की चिता में अग्नि देने की भी अनुमति नहीं थी। और उसका अपराध क्या था? सिर्फ यही कि वह शिक्षित होना चाहता था!

गांधी बहुत मतांध विचार रखते थे, और मतांध विचार और अहिंसा की आपस में नहीं बनती। हर किसी को शौचालय साफ करना होता था… और उन्हें पाश्चात्य ढंग के शौचालय मत समझना—भारतीय शौचालय गंदे से गंदे, घिनौने सॆ घिनौने होते हैं।

उन्होंने अपनी पत्नी को अपने आश्रम के शौचालयों की सफाई में भाग लेने के लिये बाध्य किया। उसने इंकार किया। लेकिन गांधी ने कहा, ‘यदि तुम इंकार करती हो, तो यह तुम्हारा घर नहीं है और मैं तुम्हारा पति नहीं हूँ।’ यह बात किसी हिंसक व्यक्ति के लिये उपयुक्त है, लेकिन एक प्रेमपूर्ण व्यक्ति के लिये नहीं।

एक रेलवे स्टेशन पर हरिदास भीड़ में छिपा था; गांधी ट्रेन से गुजर रहे थे और हरिदास दूर से सिर्फ अपने पिता का चेहरा, अपनी माँ का चेहरा देखना चाहता था। लेकिन गांधी को अपने अनुयायियों से सूचना मिल गयी थी कि अगले स्टड पर हरिदास इंतजार कर रहा था। डिब्बे के सभी दरवाजे, खिड़कियां बंद कर दी गयीं, और गांधी ने अपनी रोती हुई पत्‍नी से कहा, ‘ तुम अपने आंसुओं को रोको, क्योंकि वे दिखाते हैं कि तुम मेरे साथ नहीं हो बल्कि हरिदास के साथ हो।’

और हरिदास ने अपराध क्या किया था? वह सिर्फ समसामयिक ढंग से सुशिक्षित हुआ था।

और गांधी के जीवन में इतनी घटनाएं हैं जिनमें वह सर्वथा हिंसक है, लेकिन ‘अहिंसा’ का छाता सब कुछ छिपा लेता है।

प्रश्न है, “समग्र स्वीकार क्या है?” पहली बात, या तो स्वीकार समग्र होता है या होता ही नहीं। ‘समग्र स्वीकार’ बताता है कि तुमने अपने अचेतन में गहरे कुछ दबा रखा है और इसे दबाये रखने के लिये तुम अपनी समग्र ताकत लगा रहे हो।

स्वीकार सरल होना चाहिए। सहज होना चाहिए, इसे किसी विशेष विचारधारा से नहीं उत्पन्न होना चाहिए। इसे तुम्हारी समझ से आना चाहिए। तब समग्र या असमग्र स्वीकार का कोई प्रश्न ही नहीं है। दृष्टि की स्पष्टता तुम्हें स्वीकार अथवा अस्वीकार दिखाएगी।

राम बोलो।।

.

.

Advertisements

From → Uncategorized

टिप्पणी करे

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: